ਲ਼ਬੁ ਪਾਪੁ ਦੁਇ ਰਾਜਾ ਮਹਤਾ ਕੂੜ ਹੋਆ ਸਿਕਦਾਰੁ॥
ਕਾਮੁ ਨੇਬੁ ਸਦਿ ਪੁਛੀਐ ਬਹਿ ਬਹਿ ਕਰੁ ਬੀਚਾਰੁ॥
ਅੰਧੀ ਰਯਤਿ ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣੀ ਭਾਹਿ ਭਰੇ ਮੁਰਦਾਰੁ॥
(
ਗੁ.ਗ੍ੰ.ਸਾ., ਅੰਕ : 468-69)

02/17/2018
Vol.7, No. 356.

सत्य, निष्ठा व न्याय आधारित समाज हेतु

अज्ञानता विरूद्ध जन-जागर्ण आन्दोलन

मिशन जनचेतना

. संकलप .

प्राकृति से अध्यात्म

मनुष्य का विकास प्राकृति में हुआ है। इस लिए उस का प्राकृति से लगाव स्वाभावक है परन्तु वह उस के लिए एक पहेली रही है। एक ओर तो प्राकृति उसे खाना उपलब्ध कराती थी-उसी के फल, सब्जियां और कन्द मूल मनुष्य का भोजन थे। प्राकृति से उसे जल, रौशनी, धूप, वायु आदि की प्राप्ति होती थी। रंग बरंगे फूल, महकती खुशबू, झूमते पत्ते और पेड़ परन्तु यह खूबसूरत, मेहरबान प्राकृति कभी कभी भयाव्ह रूप भी धारण कर लेती थी। गर्मी होती तो पौधे कुमला जाते, पत्ते सूख जाते, पेड़ वीरान हो जाते। तूफानी आंधियाँ चलतीं तो बहुत कुछ टूट जाता, वृक्ष भूमि पर गिर जाते। वर्षा होती तो दिनों तक बंद नहीं होती। सभी ओर जल-थल, जल-थल हो जाता। भूमि में छिपे जीव जन्तु बाहर आ जाते और काटने लगते। अनेक की मृतु हो जाती परन्तु कई तो तड़प तड़प कर मरते। कई बार वर्षा होने का नाम ना लेती। धरती सूख जाती, खाने को भी नहीं होता। ऐसे में यदि आग लग जाती तो कई कई माह धूआं नाक में दम किए रहता। एक के पश्चात एक पेड़ जलते रहते, आग बुझने का नाम नहीं लेती। प्रकृति पर आश्रित मनुष्य आहत, भयभीत हो जाता। उस की समझ में नहीं पड़ता कि प्राकृति उस से रूठ क्यों गई, नाराज़ क्यों हो गई।

भुक्त-भोगी मनुष्य ने आत्म निरीक्षण किया-खुश तो वह भी होता है। अपनी खुशी को वह अन्य से बांटता भी था-किसी से प्रेम करता, किसी को खाने को देता, किसी को बहलाता, फुस्लाता परन्तु यदि नाराज़ होता तो स्वंय भी परेशान होता और अन्य को भी दुखी करता-किसी से रूठ जाता, किसी को डांट देता। गुस्से में होता तो मार-पीट करने से भी पीछे नहीं रहता। प्राकृति भी अवश्य उसी जैसी होगी-प्रसन्न होती है तो प्रत्येक को कुछ न कुछ देती है, खुश करने का प्रयास करती है और जब नाराज़ होती है तो सभी को परेशान करती है। इस प्रकार प्राकृति का मानवीयकर्ण हो गया। 

अब प्राकृति को विभिन्न भागों में बांटना सुगम था। वर्षा, अगनी, गगन, सूर्य, चंद्रमा, तारों, सर्प आदि से वह अवगत था ही। यह उस के लिये पूज्य हो गये। सुखी व सुरक्षित जीवन हेतु इन्हीं की कृपा चाहिये थी। उस के लिए इन की पूजा अर्चना की जानी अनिवार्य थी, कुछ न कुछ भेंट भी तो किया जाना चाहिये था। मनुष्य का प्राकृति से अध्यात्म की ओर सफर इस प्रकार प्रारंभ हुआ।

प्राकृति के मानवीयकरण से इन दैवी शक्तियों का विभाजन आसान हो गया परन्तु उन की संख्या बढ़ गई। प्रत्येक कार्य के लिए भिन्न देवी, देवते की संरचना की गई और प्रत्येक का चरित्र भी निश्चित हो गया। उस के अनुरूप उन की ऊपासना होने लगी। इस के लिये पुजारी भी नियुक्त कर लिये गए। वह अपने देवी-देवते का गुणगाण बढ़ चढ़ कर करने लगे। विभिन्न कथाऐं उन के साथ जुड़ने लगीं। यह बहस भी होने लगी कि उन मे से कौन सा बड़ा है। इस का समाधान एक ईश्वर के संकल्प में हुआ। माना जाने लगा कि एक सर्वशक्तिमान ईश्वर है जिस ने इस ब्रहामांड की उत्पति की है और वही इसे चला भी रहा है। इस बड़आकारी कार्य हेतु उस ने विभिन्न देवी देवताओं की नियुक्ति की हुई है। यह संसार उन्हीं की इच्छा से चल रहा है।

इस संकल्प पर कई प्रश्नचिन्ह लगने ही थे, विशेषत: वह कौन है, कैसा है, कहां रहता है। इन का उत्तर देने का प्रयत्न प्रत्येक धर्म में किया गया है। इन का कोई विश्वसनीय साक्ष भले ही उपलब्ध नहीं हो परन्तु यह व्यावहारिक और हृदयस्पर्शी है। मनुष्य का जीवन भी तो इसी प्रकार चलता है और प्राकृति का भी तो मानवीकरण किया गया है।

यह सभी कुछ सुखी, सुरक्षित मानवता हेतु हुआ परन्तु जब तक अज्ञानता रहेगी, कार्य-कारण का सम्बंध स्थापत किए बगैर निर्णय लिये जाएंगे, मनुष्य दुखी और असुरक्षित ही रहेगा, उस का शोषण होता रहेगा। एक ईश्वर और उस का प्राभौतिक मंत्री-मंडल भी शोषण का माध्यम बन गया।

अनेक देवी-देवतों के होते हुए, उन की पूजा अर्चना, भेटा देने के बावजूद जब मनुष्य की मुश्किलें आसान नहीं हुईं तो धर्माचारियों से प्रश्न किए जाने लगे-हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?”

मनुष्य को मात लोग से विदा करते समय विधाता ने उस का भाग्य निर्धारित कर दिया था। उस के माथे, हाथों, पावों की लकीरें उसी ने लिखी हैं। इसी लिए प्रत्येक मनुष्य की रेखाऐं भिन्न होती हैं और यह मिटती नहीं हैं। जो लिखा कर आए हो, वह तो भोगना ही होगा, खुशी से करो अथवा दुखी हो कर करो।

परन्तु इन रेखाओं का कोई आधार तो होगा?”

इन का आधार मनुष्य द्वारा पूर्व जन्म में किए गए कर्म होते हैं। जिस ने अच्छे कार्य किए थे, उसे इस जन्म में उस का फल मिल गया। बुरे कर्मों का परिणाम तो बुरा ही होगा।

इस दर्शन से पुजारी श्रेणी को सुरक्षा भी उपलब्ध हो गई और मनुष्य द्वारा किए जाते कार्यों की श्रेणियां भी बन गईं। पुजारियों द्वारा किए जाते कार्य उत्तम श्रेणी में शामिल कर लिए गए। उन को दान दक्षणा पुन्य हो गई। इज्जत, मान, सत्कार उन का अधिकार हो गया।

मनुष्य में किसी से काम लेने के लिए उस की प्रशंसा करने, लाभ पहुंचाने की अभिरूचि आदिकाल से रही है। भगवान तथा उस द्वारा नियुक्त देवी-देवता की प्रशंसा में गीत गाना, भजन करना, उसे भेंट देना अथवा काम होने पर भेंट का वादा, प्रतिज्ञा करना उस ने छोड़ा नहीं, ना पहले, ना आज।