ਲ਼ਬੁ ਪਾਪੁ ਦੁਇ ਰਾਜਾ ਮਹਤਾ ਕੂੜ ਹੋਆ ਸਿਕਦਾਰੁ॥
ਕਾਮੁ ਨੇਬੁ ਸਦਿ ਪੁਛੀਐ ਬਹਿ ਬਹਿ ਕਰੁ ਬੀਚਾਰੁ॥
ਅੰਧੀ ਰਯਤਿ ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣੀ ਭਾਹਿ ਭਰੇ ਮੁਰਦਾਰੁ॥
(
ਗੁ.ਗ੍ੰ.ਸਾ., ਅੰਕ : 468-69)

04/25/2017
Vol. 7, No.: 79

 दिल्ली डायरी .

भाजपा में फेयर होते लवली

अरविंदर सिंह कांग्रेस की तरह भाजपा के लिए फेयर एंड लवली रहते हैं या नहीं यह अलग बात है पर यह जरूर है कि उन्होंने जिस कांग्रेस पार्टी में दो दशक तक खाया पिया आखिर उसी थाली में छेद जरूर कर दिया। लवली की इस राजनीतिक महतवाकांछा को उनकी फितरत कहा जाए या फिर अजय माकन की दरोगाई के खिलाफ बगावत पर यह जरूर कि लवली के इस फेसले से थू थू माकन की भी खूब हुई। लवली इससे पहले भी ऐसी हरकत कर चुके हैं। अब माकन के खिलाफ हुए हैं तो पहले मंत्री रहने के दौरान मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सोनिया गांधी का दरबाजा खटखटाया था। लवली भाजपा में कोई अचानक नहीं गए, बल्कि माकन के अध्यक्ष बनने के बाद से ही उन्होंने मोर्चा खोल दिया था हां तब यह खेल यूथ कांग्रेस  अध्यक्ष अमित मलिक की शागिर्दी में चल रहा था। विरोधियों के खिलाफ प्रदर्शन की तैयारी से पहले ही युवक कांग्रेस अध्यक्ष अमित मलिक कार्यक्रम कर दिया करते थे। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ एक मकसद कि माकन को दिल्ली की राजनीति में निपटा देना। मुख्य मंत्री शीला दीक्षित के इस बयान ने कि माकन को राष्ट्रीय राजनीति से हटाकर दिल्ली की बागडोर आखिर क्यों दी गई से जाहिर हो गया है कि माकन को कांग्रेसी दिल्ली के, लिए फिट नहीं समझ रहे थे । और अब यह साबित भी हो गया कि माकन के चलते कांग्रेस बिखर चुकी है। आज लवली ने इसकी शुरूआत की है तो कल कई दिल्ली के नेता भजपा पर भरोसा करने को तैयार हैं। पर सबाल तो यह है कि भाजपा उनको चाहती है या नहीं। भाजपा के  अगर विकल्प है तो कांग्रेस के नेताओं की हालत बैगर हैज नो च्वाइस वाली है। पर कांग्रेसियों को समझना चाहिए कि लवली को शा मिल करने के पीछे भाजपा का गणित यह भी रहा होगा कि लवली के, इलाके गांधीनगर मेंभाजपा कमजोर. थी और दूसरे पार्टी को एक मजबूत सिख नेता मिल गया। मदन लाल खुराना सरकार में मंत्री रहे हरशरण सिंह बल्ली के निपटने के बाद से भाजपा सिखों पर अपनी पकड खोती जा रह थी। जिसकी पूर्ति लवली ने कर दी। अब लवली को पार्टी अगर विधानसभा लडाती है तब तो ठीक है नहीं तो अरविंर सिंह फेयर होते हुए, भी लवली कैसे रह पांएगे यह वह फैसला करेंगे पार्टी तो वैसे ही पलडा़ झाड सकती जैसे दूसरे नेताओं के साथ झाड चुकी है। हां यह ठीक है कि फिलाहल भाजपा में लवली की छड़दीकलां है ही।

सूप तो सूप छलनी भी

दिल्ली कांग्रेस में वर्चस्व की लडाई में सिकदर कौन होगा इसका फैसला तो दिसंबर मे कांग्रेस संगठन का फिर से गठन होने के बाद ही होना है पर इससे पहले पार्टी में जो छितराव हो रहा है उससे ये कांग्रेसी खुद को ही निपटा ले रहे हैं। मजे की बात है कि जिस नेता को जितना ज्यादा मिला वो उतनी जोर से चिल्ला रहा है। भले वे अशोक वालिया हों ,अरविंदर लवली, हों या फिर हारून यूसुफ, माकन या फिर अमित मलिक और बरखा सिंह ही क्यों नहीं। जिन लवली को पार्टी ने मंत्री, विधयाक, और दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष बनाया वही लवलीवे पार्टी के विरोध में खडे हुए । एच के एल भगत के यहां हाजिरी लगाने वाले अशोक वालिया हारून यूसुफ ,माकन को तीन तीन बार मंत्री ,विधायक बनाया ,इसी तरह बरखा सिंह को मोनिका मलहोत्रा को हटाकर दिल्ली महिला आयोग का मुखिया, विधायक बनाया ,अमित मलिक को नौजवानों की कमान पर फिर भी इनकी महत्वाकांछा पूरी नहीं हुई। तभी तो जो बरखा चल नहीं पा रहीं थीं वो बरखा अब राहुल गाँधी का ब्रेन मैपिंग कर यह बता रही हैं कि राहुल गांधी का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। राहुल कांग्रेस छोडें मै क्यों । यूं ही अपने लवली की हिम्मत देखिए कि पार्टी में उनकी अनदेखी हो रही थी। अगर तीन बार विधायक और दो बार मंत्री, व दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष बनने, के बाद को अनदेखी कहते हैं तो राजनीति में अनदेखी किसे रास नहीं आ जाएगी। ऐसे ही कांग्रेस के एक कथित युवा नेता के घूस  लेने की सीडी के बाबजूद भाजपा ने पुचकार लिया तब भाजपा भी कैसे खुद ईमानदार होने का दंभ भर सकती है। या फिर यूं कहिए कि राजनीति के इस मौसम में कांग्रेसियों यह बुखार चढा हुआ है कि कांग्रेस को गरियाओ और भाजपा में जाकर अपने पाप धोलो नहीं तो कब मोदी के जाल में फंसो सोच भी नहीं पाओ। बाजपा में शामिल होने की कतार में खडे इन नेताओं से कोई यह पूछे कि चहेते को टिकट नहीं मिलना ही अगर अनदेखी है तो वे यह भी जान लें कि पूर्व सांसद सज्जन कुमार का चेला होते हुए भी माकन ने उनके कई चहेतों टिकट देने में गुरेज रखा जबकि भगत ने जगदीश टाइटलर से विरोध के बाबजूद उनके लोगों को सिर्फ इसलिए चुनाव लडाया था क्योंकि वे जीत सकते थे ।यानी विरोध तो पार्टी में रहकर ही होता है न कि बाहर रहकर। हां अगर राजनीति में सिर्फ सुख ही एक मात्र मानदंड है तब तो पार्टी के सिदातों का, मतलब भी क्या रह जाता है। सच पूछिए तो भाजपा में भी स्वागत मालाऐं पहना कर होता है और विदाई पिछले रास्ते कब होती है यह पिछले दरबाजे की बंद रखा जाता है। अब फैसला कांग्रेसियों का ।

माकन का इस्तीफा !

दिल्ली नगर निगम चुनावों में भाजपा और आप ही कांग्रेस को निपटते नहीं देख रही हैं बल्कि खुद कांग्रेस के नेता भी इससे एक कदम आगे का अनुमान लगा चुके हैं यानी चुनावों में हार के बाद अजय माकन का इस्तीफा । यही नहीं कांग्रेस के एक नेता तो यहां तक दावा करते हैं कि अगर माकन ने ऐसा नहीं किया तो दिल्ली के तकरीबन आधे कांग्रेसी कांग्रेस छोड़ देंगे। पिछले दिनों भाजपा और आप ने   अपने अपने सर्वे में जो सीटें कांग्रेस की गिनाई हैं उससे माकन भले इततिफाक न रखते हो पर कांग्रेसियों को अपने नेता की काबिलियत पर पूरा भरोसा है ।इन नेाओं का तो यहां कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन के चलते 272 सीटों में से 50 का आंकडा भी पूरा नहीं कर पाएगी।यानी मौजूदा 72 सीटों में से वह तकरीवन 25 सीटें गंवा बैठ सकती है। इसे कांग्रेस के नेताओं की अपनी पार्टी के साथ स्वामी भक्ति कहैं या फिर अपने  मुखिया माकन से नाराजगी कि माकन के दिल्ली कांग्रेस में रहते पार्टी का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा है। और तभी ये कांग्रेसी यह कहने से भी गुरेज नहीं रखते कि अगर माकन की लगाम नहीं कसी गई या उन्हें हटाया नहीं जाता तो वे दिन दूर नहीं जब यह कहा जाने, लगेगा कि एक थी कांग्रेस! अब कांग्रेस का ऐसा हाल आपसी कलह के चलते हो रहा है या फिर लगातार हार ने उसे निराश कर दिया है यह बात अलग है पर यह जरूर है कि डूबते जहाज से चूहे कूदने की तरह कांगेस के नेताओं को उस भाजपा में  भविष्य दिखने लगा जो वन टू वन में कभी कांग्रेस से पछाड़ खाती रही ।

आर या पार

दिल्ली नगर निगम को करप्शन बनाने के दावों के बीच तीनों प्रमुख पार्टियों में आर पार की बाजी लगी है। भाजपा और आप की बात तो दिल्ली की समझ में आ रही है पर कांग्रेस की बेमानी दिख ही है। अपने अपने सर्वे और आंकडों के खेल में मतदाता उलझा है। भाजपा और आप अपनी 150 से उूपर ही सीटें मान चुके हैं। पर निगम की सीटों की 272 ही सो थोडी थोडी कांग्रेस सहित दूसरी पार्टियों भी लंगीं ही सो आंकड़ों के खेल को खेल समझें। निगम में रही घूसखोरी के बाद जिन्हें भाजपा ने टिकट दिया उन पर लोग मोदी और अमित शाह की बजह  से भरोसा करने को मजबूर हैं। और तभी चुनाव प्रचार और मतदान के यह कहा जाने लगा कि भाजपा 150 तक या फिर 200 पार । यानी मनोज तिवारी या दूसरे नेताओं का बूता 150 तक ही और अगर मोदी लहर चली तो 200 पार । यही हाल आप का माना जा रहा  पंजाब चुनावों में हार के, बाद केजरीवाल का बुखार लोगों पर. से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ से उतरा है। पर फिर भी अगर पानी माफ और बिजली हाफ के बाद हाउस टैक्स का केजरी नारा चल निकला तो बाकी सभी हाफ होने का भी खुल सकता है। पर चुनावी गणित के, भाजपाई कांग्रेस की खुशी मे खुद को खुश होते देख रहे हैं। यानी कांग्रेस की मजबूती का मतलब भाजपा की निगम में जीत तय। हां फिर भी लोग कांग्रेस को तीसरे पायदान पर देख रहे हैं। हां जो लोग पिछले तीन साल से बिजली की राहत या तीन चार महीने से पानी का मजा ले रहे हैं और हाउस टैक्स माफी का इंतजार कर रहे हैं उन्हें तो मोदी लहर का भी कोई मतलब नहीं दिख रहा है। यानी कायदा जिसमें फायदा के रास्ते को अपना चुके हैं।

 अरविंदर भाजपा के लवली

कांग्रेस छोड भाजपा में शामिल हुए अरविंदर सिंह लवली को अब भाजपा एक बडे सिख नेता के रूप में तैयार करने तैयारी मेंदिख रही है। आप के 21 विधायकों पर संकट के बाद पांच और विधायक पार्टी छोडने की तैयारी में बताए जा रहे हैं । ऐसे मे केन्द्र में बैठी भाजपा एक साल बाद दिल्ली में विधानसभा चुनावों की दस्तक या सत्ता परिवर्तन होते देख रही है। लवली भाजपा के ऐसे में एक काबिल सिख नेता साबित होते दिख रहे हैं। यूं भाजपा मे इस स्तर पर कोई सिख नेता था भी नहीं । आर.पी.सिंह या मनिंदरसिंह धीर को शायद पार्टी में इतना मजबूत माना होगा। दिल्ली स्तर पर पार्टी में बल्ली के बाद से यह कमी महसूस होती बताई जा रही थी। अब भले यह कहा जा रहा हो कि लवली के पार्टी में शामिल होने के बाद भाजपा को सिख नेता की कमी नहीं खलेगी और साथ सिख वोट पहले से ज्यादा जुड सकेगा। पर यह भी सही कि लवली के बाद भाजपा सिख नेताओं को अपने पर कतरते भी दिखने लगे हैं।

(साभार:WhatsApp)